संसद में बड़ा मुद्दा – डिलिमिटेशन बिल ||
👉भारत की संसद में हाल ही में डिलिमिटेशन बिल 2026 को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद और गंभीर बहस देखने को मिली है। यह बिल देश की लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के पुनः निर्धारण (redrawing of constituencies) से जुड़ा हुआ है। सरल शब्दों में समझें तो इसका मतलब है कि देश में बढ़ती जनसंख्या के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी और हर सीट की सीमा (boundary) क्या होगी। संविधान के अनुसार यह प्रक्रिया हर जनगणना (census) के बाद होनी चाहिए, लेकिन 1976 के बाद से सीटों की संख्या को स्थिर (freeze) कर दिया गया था ताकि राज्यों के बीच राजनीतिक असंतुलन न बढ़े। अब 2026 में सरकार इस प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है, जिससे यह मुद्दा और भी संवेदनशील बन गया है।
सरकार का कहना है कि डिलिमिटेशन जरूरी है क्योंकि देश की जनसंख्या में बहुत बड़ा बदलाव हो चुका है और लोकतंत्र में “एक व्यक्ति – एक वोट – समान मूल्य” के सिद्धांत को सही तरीके से लागू करने के लिए सीटों का पुनर्वितरण जरूरी है। सरकार यह भी तर्क दे रही है कि जिन राज्यों की जनसंख्या ज्यादा है, उन्हें संसद में अधिक प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए ताकि विकास और नीतियों में संतुलन बना रहे। इसके साथ ही यह बिल महिला आरक्षण से भी जुड़ा हुआ माना जा रहा है, क्योंकि भविष्य में लोकसभा और विधानसभा में 33% महिला आरक्षण लागू करने के लिए भी नए परिसीमन की आवश्यकता होगी।
लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष इस बिल का जोरदार विरोध कर रहा है। विपक्ष का आरोप है कि यह सिर्फ तकनीकी सुधार नहीं बल्कि एक राजनीतिक कदम है, जिससे देश का चुनावी संतुलन बदल सकता है। खासकर दक्षिण भारत के राज्यों को डर है कि जहां जनसंख्या नियंत्रण बेहतर रहा है, वहां सीटों की संख्या कम बढ़ेगी, जबकि उत्तर भारत के राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा। इससे संसद में शक्ति संतुलन बदल सकता है और कुछ राज्यों का प्रभाव कम हो सकता है। विपक्ष का यह भी कहना है कि सरकार इस बिल का इस्तेमाल राजनीतिक फायदे के लिए कर रही है, जिससे भविष्य के चुनावों में एक पार्टी को बढ़त मिल सकती है।
संसद में इस मुद्दे पर भारी हंगामा और तीखी बहस देखने को मिली। कई सांसदों ने इसे लोकतंत्र के लिए “संवेदनशील और निर्णायक बदलाव” बताया, जबकि कुछ ने इसे “संघीय ढांचे (federal structure) पर खतरा” कहा। बहस के दौरान बार-बार आरोप-प्रत्यारोप हुए और सदन का माहौल तनावपूर्ण रहा।
कुल मिलाकर, डिलिमिटेशन बिल केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह भारत की राजनीति, चुनावी प्रणाली और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन को सीधे प्रभावित करने वाला मुद्दा बन चुका है। आने वाले समय में अगर यह बिल आगे बढ़ता है तो 2029 के लोकसभा चुनाव और देश की राजनीतिक दिशा पर इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है।
